Wednesday, 10 February 2016

विशिष्ट शैक्षिक आवश्यकताओं वाले बालकों की शिक्षा


समावेशन शब्द का अपने आप में कुछ खास अर्थ नहीं होता है । समावेशन के चारों ओर जो वैचारिक, दार्शनिक, सामाजिक और शैक्षिक ढ़ाँचा होता है वही समावेशन को परिभाषित करता है । समावेशन की प्रक्रिया में बच्चे को न केवल लोकतंत्र की भागीदारी के लिए सक्षम बनाया जा सकता है, बल्कि यह सीखने एवं विश्वास करने के लिए भी सक्षम बनाया जा सकता है कि लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए दूसरों के साथ रिश्ते बनाना, अर्न्तक्रिया करना भी समान रूप से महत्वपूर्ण है ।  
                                                                              (एन.सी. एफ. 2005, पृष्ठ 96)
स्वतंत्रता के बाद शिक्षा प्रणाली की क्या उपलब्धि रही है, यदि हम इस ओर ध्यान दें तो संभवतः हमें कुछ संतोषजनक आंकड़े मिलेंगे। आज भारत की विद्यालय शिक्षा व्यवस्था चीन के पश्चात् विश्व की दूसरी सबसे बड़ी शिक्षा व्यवस्था है । जहाँ तकरीबन 10 लाख स्कूलों में 2025 लाख बच्चों को पढ़ाने का काम लगभग 55 लाख शिक्षक कर रहे हैं। 82 प्रतिशत रिहाइशी इलाकों में एक किलोमीटर की परिधि के अन्दर प्राथमिक और 75 प्रतिशत रिहाइशी इलाकों में तीन किलोमीटर के अंदर उच्च प्राथमिक पाठशाला हैं। माध्यमिक स्तर की परीक्षा में भाग लेने वाले बच्चों में कम से कम 50 प्रतिशत बच्चे परीक्षा में उत्तीर्ण होते हैं। इस सबके पश्चात् भी वर्तमान में लाखों बालक शिक्षा की मुख्यधारा से वंचित है । बावजूद इसके आज भी हमारें विद्यालय ऐसे बालकों के लिए साधनहीन नजर आते है जिनकी विभिन्न ज्ञानेन्द्रिय, शारीरिक , बौद्धिक,  सामाजिक, आर्थिक कारणों के कारण कुछ विशिष्ट शैक्षिक आवश्यकतायें है ।
वर्तमान में विशिष्ट शैक्षिक आवश्यकताओं वाले बालकों के लिए शिक्षा की दो प्रकार की व्यवस्थाएं है । एक वह जिन्हे हम विशेष विद्यालय कहते है, जो ज्यादातर शहरों मे स्थित आवासीय है ।  जिनका उदेद्श्य केवल एक प्रकार के विशिष्ट बालकों की विशिष्ट शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करना होता है । और दूसरा तरीका है कि उन्हे अन्य सभी बालकों के साथ  आस-पड़ोस के सामान्य विद्यालय में भेजा जाये और वही उनकी विशिष्ट शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करने की व्यवस्था कि जायें। यदि बालक इस प्रकार के विद्यालय में जाता है तो वह अपने अन्य भाई बहनों के समान अपने माँ बाप के साथ रह सकता है । दूसरा इस प्रकार के विद्यालयों में  सभी बालक एक दूसरे से मिलजुल कर एक दूसरे से सीख सकते है । इसके अलावा बालक को बाद में अपने आपको दुनिया में समायोजित करने में सहायता मिलती है क्योंकि आखिरकार उसको रहना तो उसको उसी समाज में है जिसका कि वो हिस्सा होता है इसलिए क्यों न बालक को प्रारम्भ से ही उस माहौल में रखा जाये जहाँ उसे विद्यालय की शिक्षा समाप्त करने के पश्चात् रहना है? इसलिए अच्छा है कि आरम्भ से बालक को  मुख्यधारा वाले ऐसे विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा जाये जहाँ अन्य सामान्य बालक भी जाते है । इस अवधारणा के साथ समावेशित शिक्षा व्यवस्था प्रणाली का आरम्भ हुआ । समावेशी शिक्षा से तात्पर्य ऐसी शिक्षा प्रणाली से है जिसमें प्रत्येक बालक को चाहे वो विशिष्ट हो या सामान्य बिना किसी भेदभाव के, एक साथ, एक ही विद्यालय में, सभी आवश्यक तकनीकों व सामग्रियों के साथ, उनकी सीखने सिखाने के जरूरतों को पूरा किया जायें ।
समावेशी शिक्षा के मायने
समावेशित शिक्षा कक्षा में विविधताओं को स्वीकार करने की एक मनोवृत्ति है जिसके अन्तर्गत विविध क्षमताओं वाले बालक सामान्य शिक्षा प्रणाली में एक साथ अध्ययन करते है । समावेशित शिक्षा के  दर्शन के अन्तर्गत प्रत्येक बालक अद्वितीय है और उसे अपने सहपाठियों  की भाँति विकसित करने के लिए कक्षा में विविध प्रकार के शिक्षण की आवश्यकता हो सकती है । बालक के पीछे  रह जाने के लिए उसे दोषी नही ठहराया जा सकता है, बल्कि उन्हें  कक्षा में भली प्रकार समाहित न कर पाने का जिम्मेदार अध्यापक को स्वंय समझना चाहिए ।
जिस प्रकार हमारा संविधान किसी  भी आधार पर किये जाने वाले भेदभाव को निषेध करता है, उसी प्रकार समावेशित शिक्षा  विभिन्न ज्ञानेन्द्रिय, शारीरिक , बौद्धिक,  सामाजिक, आर्थिक आदि कारणों से उत्पन्न किसी बालकों की, विशिष्ट शैक्षिक आवश्यकताओं के बावजूद उन बालकों  को भिन्न देखे जाने के बजाए स्वंत्रत अधिगमकर्त्तों के रूप में देखती है ।
समावेशित शिक्षा का महत्त्व एवं आवश्यकता
क्र    समावेशित शिक्षा प्रत्येक बालक के लिए उच्च और उचित उम्मीदों के साथ, उसकी व्यक्तिगत शक्तियों का विकास करती है ।
क्र    प्रत्येक बालक स्वाभाविक रूप से सीखने के लिए अभिप्रेरित होता है ।
क्र    समावेशित शिक्षा अन्य बालकों, अपने स्वयं के व्यक्तिगत आवश्यकताओं और क्षमताओं के सामंजस्य स्थापित करने में सहयोग करती है ।
क्र    समावेशित शिक्षा सम्मान और अपनेपन की विद्यालय संस्कृति के साथ-साथ व्यक्तिगत मतभेदों को स्वीकार करने के लिए अवसर प्रदान करती है ।
क्र    समावेशित शिक्षा बालक को अन्य बालकों के समान  कक्षा गतिविधियों में भाग लेने और व्यक्तिगत लक्ष्यों पर कार्य करने के लिए अभिप्रेरित करती है ।
क्र    समावेशित शिक्षा बालकों की शिक्षा गतिविधियों में उनके माता-पिता को भी सम्मिलित करने की वकालत करती है ।
समावेशित शिक्षा सही मायनों में शिक्षा का अधिकार जैसे शब्दों का रूपान्तरित रूप है जिसके कई उद्द्श्यों में से एक उद्देश्य है,विशिष्ट शैक्षिक आवश्यकताओं वाले बालकों को एक समतामूलक शिक्षा व्यवस्था के अन्तर्गत शिक्षा प्राप्त करने के अवसर प्रदान करना। समावेशित शिक्षा समाज के सभी बालकों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने का समर्थन करती है  ।
शिक्षा में समावेशन के आधार
क्र    प्रत्येक बालक स्वाभाविक रूप से सीखने के लिए अभिप्रेरित होता है ।
क्र    बालकों के सीखने के तौर तरीकों में विविधता होती है । अनुभवों के द्वारा, अनुकरण के माध्यम से, चर्चा, प्रश्न पूछना, सुनना,  चिंतन मनन, खेल क्रियाकलापों, छोटे व बड़े समूहों में गतिविधियों  करना  आदि  तरीकों के माध्यम से बालक अपने आसपास के परिवेश के बारे में जानकारी प्राप्त करता है । इसलिए प्रत्येक बालक को सीखने-सिखाने के क्रम में समुचित अवसर प्रदान करना आवश्यक है ।
क्र    बालकों को सीखने से पूर्व सीखने-सिखाने के लिए तैयार करना आवश्यक होता है इसके लिए सकारात्मक वातावरण निर्मित करने की जरूरत होती है ।
क्र    बालक उन्ही सीखी हुई बातों के साथ अपना संबंध स्थापित कर पाता है जिनके बारे में उसके अपने परिवेश के कारण भली-भाँति समझ विकसित हो चुकी हो।
क्र    सीखने की प्रक्रिया विद्यालय के साथ साथ विद्यालय के बाहर भी निरन्तर चलती रहती है । अतः सीखने-सीखने की प्रक्रिया  कों इस प्रकार व्यवस्थित किये जाने की आवश्यकता है जिससे बालक पूर्ण रूप से उसमें सम्मिलित हो जाये और उसके बारे में अपने आधार पर अपनी समझ विकसित करें ।
क्र    सीखने-सिखाने की प्रक्रिया आरम्भ करने से पूर्व बालक के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, भूगौलिक व राजनीतिक परिप्रेक्ष्य को जानना आवश्यक है ।
क्र    प्रत्येक बालक की विविधता के प्रति आदर रखना ।
समावेशित शिक्षा हेतु रणनीतियाँ
समावेशित शिक्षा हेतु कुछ रणनीतियाँ इस प्रकार हो सकती है :-
समावेशित विद्यालय वातावरण :-  बालकों की शिक्षा  चाहे वह किसी भी स्तर की हो, उसमें  विद्याालय के वातावरण का  बहुत  योगदान होता है। विद्यालय का वातावरण ही कुछ चीजों  की शिक्षा बालकों को स्वंय भी दे देता है । समावेशित शिक्षा के लिए यह आवश्यक है कि विद्यालय का वातावरण सुखद और स्वीकार्य होना चाहिए । इसके अतिरिक्ति विद्यालय  में  विशिष्ट बालकों की विशिष्ट शैक्षिक, चलिष्णुता, दैनिक आदि  आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु आवश्यक साज-समान शैक्षिक सहायताओं, उपकरणों, संसाधनों, भवन आदि का समुचित प्रबंध आवश्यक है । बिना इनके विद्यालय में समावेशित माहौल बनाने में कठिनाई हो सकती है ।
सबके लिए विद्यालयः-   समावेशित शिक्षा की मूल भावना है एक ऐसा विद्यालय जहाँ सभी बालक एक साथ शिक्षा प्राप्त करते है, परन्तु सामान्यतः इस तरह की बातें देखने और सुनने में आती रहती है कि किसी बालक को उसकी विशिष्ट शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करने में अपनी असमर्थता दर्शाते हुए, विद्यालय में प्रवेश देने से मना कर दिया या किसी विशेष विद्यालय में उसके दाखिले के लिए कहा हो।
समावेशित शिक्षा के उद्देश्यों को सभी बालकों तक पहुचाने के लिए यह आवश्यक है कि विद्यालय में दाखिले की नीति में परिवर्तन किया जाना चाहिए । हालाँकि शिक्षा के अघिकार अधिनियम 2009 इस सन्दर्भ में एक प्रभावी कदम कहा जा सकता है परन्तु धरातल पर इसकी वास्तविकता में अभी भी संदेह होता है ।
बालकों के अनुरूप पाठ्यक्रम :- बालकों को शिक्षित करने का सबसे असरदार तरीका है कि उन्हे खेलने के तरीकों तथा गतिविधियों के माध्यम से  सीखाने का प्रयास किया जाना चाहिए। समावेशित शिक्षा व्यवस्था के लिए आवश्यक है कि विद्यालय पाठ्क्रम, बालकों की अभिवृत्तियों, मनोवृत्तियों, आकांशाओं तथा क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए निर्घारित किया जाना चाहिए । इसके अतिरिक्त पाठ्क्रम में विविधता तथा पर्याप्त लचीलता होनी चाहिए ताकि उसे  प्रत्येक बालक की क्षमताओं, आवश्यकताओं, तथा रूचि के अनुसार अनुकूल बनाया सकें, बालकों मे विभिन्न योग्यताओं व क्षमताओं का विकास हो सकें, उसे  विद्यालय से बाहर, बालक के सामाजिक जीवन से जो जोड़ा जा सकें, बालकों को सामाजिक रूप से एक उत्पादित नागरिक बनाने में योगदान दे सकें  इसके अतिरिक्त बालक के समय का सदुपयोग करने की शिक्षा प्राप्त हो सकें । 
मार्गदर्शन व निर्दैशन की व्यवस्थाः- विशेष आवश्यकताओं वाले बालकों की शिक्षा एक जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है । इस प्रक्रिया में नियमित शिक्षक, विशेष शिक्षक, अभिभावक और परिवार, समुदायिक अभिकरणों के साथ विद्यालय कर्मचारियों के बीच सहयोग और सहकारिता शामिल है ।
समावेशित शिक्षा व्यवस्था के अर्न्तगत धर से विद्यालय जाते समय बालक को आरम्भ में नये परिवेश में अपने आपको समायोजित करने में कुछ असुविधा हो सकती है । जैसे आरम्भ में कक्षा के कार्यों में  सामंजस्य स्थापित करने में कठिनाई होना, दोस्तों का आभाव, नामकरण आदि के करण बालक के आत्मविश्वास में कमी होना । इसके अतिरिक्त किशोरावस्था के दौरान होने वाले शारीरिक, मानसिक, सामाजिक परिवर्तनों के कठिनाई के दौर में मार्गदर्शन एवं निर्देशन से बालक को इस संक्रमण काल में काफी सहायता मिलती है । उचित मार्गदर्शन व निर्दैशन से बालक और उसके माता-पिता दोनों ही इन परिवर्तनों के लिए मानसिक, शारीरिक और सामाजिक रूप से तैयार किये जा सकते है ।

Friday, 8 January 2016

पाठ्यचर्या

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
औपचारिक शिक्षा के क्षेत्र में पाठ्यचर्या या पाठ्यक्रम (करिकुलम) विद्यालय या विश्वविद्यालय में प्रदान किये जाने वाले पाठ्यक्रमों और उनकी सामग्री को कहते हैं। पाठ्यक्रम निर्देशात्मक होता है एवं अधिक सामान्य सिलेबस पर आधारित होता है जो केवल यह निर्दिष्ट करता है कि एक विशिष्ट ग्रेड या मानक प्राप्त करने के लिए किन विषयों को किस स्तर तक समझना आवश्यक है।

ऐतिहासिक संकल्पना


सदिश पाठ्यक्रम
1918 में इस विषय पर प्रकाशित प्रथम पुस्तक द करिकुलम में[1] जॉन फ्रेंकलिन बौबिट ने कहा कि एक विचार के रूप में पाठ्यक्रम की जड़ें रेस-कोर्स के लिए लैटिन शब्द में है और पाठ्यक्रम का वर्णन ऐसे कार्यों एवं अनुभवों के रूप में किया है जिनके माध्यम से बच्चे अपेक्षित वयस्क के रूप में विकसित होते हैं ताकि वयस्क समाज में सफलता प्राप्त की जा सके. इसके अलावा, पाठ्यक्रम में केवल विद्यालय में होने वाले अनुभव ही नहीं बल्कि विद्यालय एवं उसके बाहर होने वाले गठन कार्य एवं अनुभव अपनी संपूर्णता में समाहित होते हैं; वे अनुभव जो अनियोजित और अनिर्दिष्ट रहे हैं और वे अनुभव भी जिन्हें समाज के वयस्क सदस्यों के उद्देश्यपूर्ण गठन की दिशा में जानबूझकर कर प्रदान किया गया है। (Cf. छवि दाहिनी ओर है)
बौबिट के लिए पाठ्यक्रम एक सामाजिक इंजीनियरिंग का क्षेत्र है। उनके सांस्कृतिक अनुमान एवं सामाजिक परिभाषाओं के अनुसार उनके पाठ्यक्रम निर्माण के दो उल्लेखनीय लक्षण हैं: (i) वैज्ञानिक विशेषज्ञ अपने इस विशेष ज्ञान के आधार पर कि समाज के वयस्क सदस्यों में क्या गुण होने चाहिए एवं कौन से अनुभव ऐसे गुण उत्पन्न करेंगे, वे पाठ्यक्रमों का निर्माण करने हेतु योग्य होंगे तथा यही न्यायसंगत भी होगा और (ii) पाठ्यक्रम को ऐसे कार्य-अनुभवों के रूप में परिभाषित है जो छात्र को अपेक्षित वयस्क बनने के लिए उसके पास होने चाहिए.
इसलिए, उन्होंने पाठ्यक्रम को लोगों के चरित्र का निर्माण करने वाले कार्यों एवं अनुभवों की ठोस वास्तविकता के स्थान पर एक आदर्श के रूप में परिभाषित किया है।
पाठ्यक्रम संबंधित समकालीन विचार बौबिट के इन तत्वों को अस्वीकार करते हैं, परंतु इस आधार को यथावत रखते हैं कि पाठ्यक्रम अनुभवों का दौर है जो मानव को व्यक्ति बनाता है। पाठ्यक्रमों के माध्यम से वैयक्तिक गठन का व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर (अर्थात सांस्कृतिक एवं सामाजिक स्तर पर) पर अध्ययन किया जाता है; उदाहरण के लिए पेशेवर गठन, ऐतिहासिक अनुभव के माध्यम से शैक्षिक अनुशासन). एक समूह का गठन उसके व्यक्तिगत प्रतिभागियों के गठन के साथ ही होता है।
यद्यपि औपचारिक रूप से यह बौबिट की परिभाषा में दिखाई दिया है, रचनात्मक अनुभव के रूप में पाठ्यक्रम की चर्चा को जॉन डेवी के कार्य में भी देखा जा सकता है (जो महत्वपूर्ण मामलों पर बौबिट से असहमत थे). हालांकि बौबिट और डेवी की "पाठ्यक्रम" के विषय में आदर्शवादी समझ शब्द के वर्तमान प्रतिबंधित उपयोगों से अलग है, पाठ्यक्रम लेखक और शोधकर्ता आम तौर पर इसे पाठ्यक्रम की एक समान तथ्यात्मक समझ के रूप में देखते हैं।[2][3]

Friday, 20 November 2015

                                                                  ब्लॉग


  वेब-लॉग शब्द का संक्षिप्त रूप ही ब्लॉग कहा जाने लगा है.

यह शब्द १९९७ में अमेरिका में प्रथम बार इंटरनेट के सन्दर्भ में आया था.

ब्लॉग का मतलब पर्सनल डायरी या ऑनलाइन डायरी ही समझा जाता है, जहाँ आप कुछ भी लिख सकते हैं.

जो आप को अच्छा लगे लिखिए.

यदि आप कुछ बातें शेअर करना चाहते हैं तो वह भी कर सकते हैं.

आप अपनी इस ऑनलाइन डायरी में अपने फोटो और वीडियो भी जोड़ सकते हैं.

अपने लिए नेट पर एक जगह बना सकते हैं.

अपने व्यक्तिगत विचारों को कहने के साथ ही साथ आप दूसरों से समर्थन भी पा सकते हैं.

चाहें तो दूसरों का समर्थन भी कर सकते हैं.

अपनी कवितायें, कहानियां, राजनीतिक विचार किसी भी बारे में लिखें.

और कमाल की बात तो ये है कि पूरा विश्व आपको देख रहा और सुन रहा होता है.

आप चाहें तो अपने ब्लॉग को छुपा भी सकते हैं यानी दुनिया की नज़रों से अदृश्य और सिर्फ़ आपको दिखे या उसे दिखे जिसे आप चाहें.

यह वास्तव में बेहद कमाल की चीज़ है,

तभी तो पूरी दुनिया ख़ुद ब्लॉग लिखने को लेकर दीवानी हुई जा रही है. आप का भी इस ब्लॉग की दुनिया में मैं E-Guru Rajeev स्वागत करता हूँ.

हाँ, एक और पते की बात जानें :

ब्लॉग को हिन्दी में चिट्ठा कहने की एक परम्परा सी चल पडी है.

हिन्दी के ब्लॉगर्स चिट्ठाकार कहे जाते हैं.

ब्लॉग क्या है इस के विषय में अच्छी जानकारी यहाँ से भी मिल जायेगी.

Wednesday, 21 October 2015

डाल्टन योजना

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
डाल्टन प्रयोगशाला योजना या 'डाल्टन योजना' (Dalton Plan) शिक्षण का एक कांसेप्ट है जिसे अमेरिका की शिक्षाशास्त्रिणी कुमारी हेलेन पार्खस्ट (Helen Parkhurst) ने आरम्भ किया।
सन्‌ 1912 में अमरीका की शिक्षाशास्त्रिणी कुमारी हेलन पार्खस्ट ने आठ से 12 वर्ष के बीच की अवस्थावाले बालकों के लिए एक नई शिक्षायोजना बनाई। यद्यपि यह योजना उनके मन में पहले से ही थी किंतु उसका वास्तविक प्रयोग सन्‌ 1913 और 1915 के बीच किया गया। इसी बीच प्रथम विश्वयुद्ध (1914-18) छिड़ गया और कुमारी पार्खर्स्ट ने भी अपनी योजना थोड़े दिन के लिए ढीली कर दी। विश्वयुद्ध समाप्त होने के पश्चात्‌ सन्‌ 1920 में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र अमरीका के मैसाच्यूसेट राज्य के डाल्टन स्थित विद्यालयों में अपनी योजना प्रारंभ की। इसके पश्चात्‌ उन्होंने एक बाल विश्वविद्यालय पाठशाला (चिल्ड्रेंस यूनिवर्सिटी स्कूल) स्थापित करके उसमें अपनी डाल्टन प्रयोगशाला योजना (डाल्टन लैबोरेटरी प्लान) का व्यवहार किया।

अनुक्रम

परिचय

उन दिनों विद्यालयों में अध्यापकों का बोलबाला था। पशुओं की भाँति छात्र कक्षारूपी बाड़े में बंद कर दिए जाते थे। अध्यापकगण जो कुछ बतला देते थे उसे वे घोटकर सुना देते थे। सुनाते समय तनिक सा भी हेरफेर हुआ कि बेतों से धुन दिए जाते थे। प्राय: विद्यालय की कक्षाएँ भी अँधेरे, सँकरे और कम हवावाले कमरों में होती थीं। विद्यार्थियों के मुँह पर ताले लगे हुए थे। मेधावी बालक को तीव्र गति से आगे बढ़ने का अवसर नहीं था और मतिमंद बालकों को अपनी मंद गति से रुक रुककर चलने की सुविधा नहीं थी। यद्यपि रूसो, पैस्टालौजी और हरबार्ट जैसे शिक्षाशास्त्रियों ने बालक के स्वतंत्र शिक्षाविकास पर बहुत कुछ लिखा और कहा था, फिर भी अधिकांश विद्यालयों में दंडवादी, प्राचीन पंथियों का साम्राज्य था। इन सब बातों से संपूर्ण शिक्षाक्रम नितांत नीरस और रोचकताशून्य हो गया था। कुमारी हेलन पार्खर्स्ट के कोमल नारी हृदय को इस कठोर, अकरुण और नीरस वातावरण से अत्यंत क्षोभ हुआ, इसलिए उन्होंने अमरीका में अपनी डाल्टन योजना चला दी। वे चाहतीं तो इस योजना के साथ मेरिया मौंतेस्सौरी के समान अपना नाम भी जोड़ देतीं किंतु उनका विश्वास है कि किसी शिक्षा प्रणाली को अपने नाम से जोड़ना और उसे बाँध देना नैतिक दृष्टि से ठीक नहीं है। उनकी यही इच्छा रही है कि इस योजना को विशेष नियमों और बंधनों में न जकड़ा जाए और इसीलिए विभिन्न देशों और स्थानों के लिए उन्होंने बड़ी छूट दे दी है। सन्‌ 1915 से 1918 तक पार्खर्स्ट ने केलिफोर्निया में मौंतेस्सरी प्रणाली का भी प्रयोग किया ओर इसीलिए कुछ लोग इस प्रणाली को मौंतेस्सरी की उपज मानते हैं किंतु तथ्य यह नहीं है।

सिद्धान्त

इस प्रयोगशाला योजना के दो मुख्य सिद्धांत हैं।
  • (1) विभिन्न विषयों के लिए निश्चित घंटों और समयसरणि के कठोर बंधनों को नष्ट करके बच्चे को स्वतंत्रतापूर्वक काम करने की सुविधा देना।
  • (2) बालक की रुचि जिस विषय में अधिक हो उसे उस विषय को जितनी देर तक वह चाहे, अध्ययन करने देना।
इन सिद्धांतों से स्पष्ट है कि यह डाल्टन योजना कोई नई शिक्षाप्रणाली नहीं है वरन्‌ एक नई प्रकार की विद्यालय व्यवस्था है। इसमें विषय तो वे ही पढ़ाए जाते हैं जो अन्य विद्यालयों में, किंतु इसमें पढ़ाई का ढंग, परिणाम और प्रकार भिन्न होता है।
इसमें समूचा पाठ्यक्रम सुविधाजनक मासिक छपी हुई ठेके की कार्ययोजना (कौंट्रेंक्ट एसाइनमेंट) के रूप में बॉट लिया जाता है जिसमें छुट्टियों के लिए, पढ़े हुए पाठ की आवृत्ति के लिए और विद्यार्थियों के स्वत: अभ्यास के लिए समय छोड़ दिया जाता है। प्रत्येक पाठ्य विषय को एक वर्ष की दस मासिक कार्ययोजनाओं में बाँट दिया जाता है और इस विद्यालय का महीना बीस दिन का होता है। इस ठेके के कार्य में नित्य का कार्य निर्दिष्ट होता है जिसे समस्या (प्रौब्लम) कहते हैं जैसे भूगोल के एक ठेके के कार्य में भारत के भूगोल का अध्ययन किया गया है, तो यह पूरा मासिक या वृहद् ठेके का कार्य है और उसके छोटे भाग, जैसे भूप्रकृति, जलवायु आदि समस्याएँ या दैनिक कार्य हैं। इनमें से कुछ समस्याओं के लिए दो दिन का और कुछ के लिए आधे दिन का समय दिया जाता है। इन समस्याओं में पढ़ने का, प्रश्नों के उत्तर देने का, मानचित्र खींचने या विवरण लिखने का तथा अन्य कार्य करने का निर्देश दिया जाता है जिससे छात्र को श्रेय (क्रेडिट) मिले। प्रत्येक विद्यार्थी इस कार्य को ठेके (कौंट्रेंक्ट) के रूप में ग्रहण करता और एक महीने के लिए दिया हुआ निर्दिष्ट कार्य निश्चित समय में पूरा करता है। इसमें स्वतंत्रता यही है कि विद्यार्थी एक मास में पूरे किए जानेवाले कार्य को अपनी इच्छा के अनुसार चाहे जिस क्रम से और जिस गति से पूरा कर सकते हैं। वे चाहें तो एक महीने के लिए दिए गए काम को दस दिन में पूरा कर सकते हैं। किंतु कार्य समाप्त करते ही वे अगले महीने के कार्य को नहीं ले सकते। वे शेष बचे हुए समय में पुस्तकालय से मनचाही पुस्तक का अध्ययन कर सकते हैं। जब छात्र मासिक कार्य का ठेका लेते हैं तो वे यह भी वचन देते हैं कि इस कार्य को पूरा करने के लिए न हम किसी को सहायता देंगे न हम किसी से सहायता लेंगे। छात्रों को इतनी छूट अवश्य रहती है कि वे अपने गुरु या अपने सहपाठियों से संमति लें किंतु कार्य उन्हें स्वत: ही पूरा करना पड़ता है।
इस योजना में कक्षाएँ लुप्त हो जाती हैं और प्रत्येक कक्षा प्रयोगशाला बन जाती है। इन विभिन्न प्रयोगशालाओं में उन उन विषयों के सब सहायक पदार्थ पुस्तक, चित्र, रेखाचित्र, प्रतिमूर्ति, यंत्र आदि विद्यमान रहते हैं। विभिन्न श्रेणियों के जो विद्यार्थी किसी एक विषय का कार्य पूरा करना चाहते हैं वे सभी उस विषय की कक्षा प्रयोगशाला में बैठकर सामग्री का उपयोग करके अपना कार्य पूरा कर सकते हैं। इस प्रकार विद्यालय में पहली, दूसरी, तीसरी कक्षा न होकर हिंदी की प्रयोगशाला, गणित की प्रयोगशाला, इतिहास की प्रयोगशाला तथा भूगोल, विज्ञान, संगीत, चित्रकला आदि विषयों की प्रयोगशालाएँ बन जाती हैं। इसीलिए वहाँ न घंटे लगते हैं न कोई बँधी हुई समयसरणि या दिनचर्या (टाइमटेबिल) ही रहती है।

Thursday, 15 October 2015

व्याकरण

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से

किसी भी भाषा के अंग प्रत्यंग का विश्लेषण तथा विवेचन व्याकरण (ग्रामर) कहलाता है। व्याकरण वह विद्या है जिसके द्वारा किसी भाषा का शुद्ध बोलना, शुद्ध पढ़ना और शुद्ध लिखना आता है। किसी भी भाषा के लिखने, पढ़ने और बोलने के निश्चित नियम होते हैं। भाषा की शुद्धता व सुंदरता को बनाए रखने के लिए इन नियमों का पालन करना आवश्यक होता है। ये नियम भी व्याकरण के अंतर्गत आते हैं। व्याकरण भाषा के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।
किसी भी "भाषा" के अंग प्रत्यंग का विश्लेषण तथा विवेचन "व्याकरण" कहलाता है, जैसे कि शरीर के अंग प्रत्यंग का विश्लेषण तथा विवेचन "शरीरशास्त्र" और किसी देश प्रदेश आदि का वर्णन "भूगोल"। यानी व्याकरण किसी भाषा को अपने आदेश से नहीं चलाता घुमाता, प्रत्युत भाषा की स्थिति प्रवृत्ति प्रकट करता है। "चलता है" एक क्रियापद है और व्याकरण पढ़े बिना भी सब लोग इसे इसी तरह बोलते हैं; इसका सही अर्थ समझ लेते हैं। व्याकरण इस पद का विश्लेषण करके बताएगा कि इसमें दो अवयव हैं - "चलता" और "है"। फिर वह इन दो अवयवों का भी विश्लेषण करके बताएगा कि (च् अ ल् अ त् आ) "चलता" और (ह अ इ उ) "है" के भी अपने अवयव हैं। "चल" में दो वर्ण स्पष्ट हैं; परंतु व्याकरण स्पष्ट करेगा कि "च" में दो अक्षर है "च्" और "अ"। इसी तरह "ल" में भी "ल्" और "अ"। अब इन अक्षरों के टुकड़े नहीं हो सकते; "अक्षर" हैं ये। व्याकरण इन अक्षरों की भी श्रेणी बनाएगा, "व्यंजन" और "स्वर"। "च्" और "ल्" व्यंजन हैं और "अ" स्वर। चि, ची और लि, ली में स्वर हैं "इ" और "ई", व्यंजन "च्" और "ल्"। इस प्रकार का विश्लेषण बड़े काम की चीज है; व्यर्थ का गोरखधंधा नहीं है। यह विश्लेषण ही "व्याकरण" है।
व्याकरण का दूसरा नाम "शब्दानुशासन" भी है। वह शब्दसंबंधी अनुशासन करता है - बतलाता है कि किसी शब्द का किस तरह प्रयोग करना चाहिए। भाषा में शब्दों की प्रवृत्ति अपनी ही रहती है; व्याकरण के कहने से भाषा में शब्द नहीं चलते। परंतु भाषा की प्रवृत्ति के अनुसार व्याकरण शब्दप्रयोग का निर्देश करता है। यह भाषा पर शासन नहीं करता, उसकी स्थितिप्रवृत्ति के अनुसार लोकशिक्षण करता है।

महत्व

यद्यपि बहु नाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्।
स्वजनो श्वजनो माऽभूत्सकलं शकलं सकृत्शकृत्॥
(पुत्र! यदि तुम बहुत विद्वान नहीं बन पाते हो तो भी व्याकरण (अवश्य) पढ़ो ताकि 'स्वजन' 'श्वजन' (कुत्ता) न बने और 'सकल' (सम्पूर्ण) 'शकल' (टूटा हुआ) न बने तथा 'सकृत्' (किसी समय) 'शकृत्' (गोबर का घूरा) न बन जाय।)

संसार का सर्वप्रथम व्याकरण

संसार में सबसे पहले "व्याकरण" विद्या का जन्म कहां हुआ?
संसार के भाषाविदों ने एकमत से स्वीकार किया है कि इस पृथ्वी पर उपलब्ध साहित्य में सबसे प्राचीन वेद है। ऋग्वेद संसार का प्राचीनतम साहित्य है। जब कोई भाषा साहित्य की समृद्धि से जगमगाने लगती है, तब उसके व्याकरण की जरूरत पड़ती है। "वेद" कैसा महत्वपूर्ण साहित्य है, यह इसी से समझा जा सकता है कि इसे इतने दिनों तक मनुष्य ने गले से लगाकर प्राणों की तरह इसकी रक्षा की है। उसके प्रत्येक मंत्र को यथास्थित रूप में कंठस्थ रखना और बहुत कुछ उसकी "ध्वनि" सुरक्षित रखना सरल काम नहीं है। सूखे चने चबा चबाकर तपस्वी ब्राह्मणों ने वेदों की रक्षा की है। तभी तो वे बने रहे।
वेद जैसे महत्वपूर्ण साहित्य के व्याकरण की जरूरत पड़ी। व्याकरण के सहारे सुदूर देश प्रदेशों के ज्ञानपिपासु कहीं अन्यत्र उद्भुत साहित्य को समझ सकते हैं और अनंत काल बीत जाने पर भी लोग उसे समझने में सक्षम रहते हैं। वेद जैसा साहित्य देशकाल की सीमा में बँधा रहनेवाला नहीं है; इसलिए प्रबुद्ध "देव" जनों ने अपने राजा (इंद्र) से प्रार्थना की-"हमारी (वेद-) भाषा का व्याकरण बनना चाहिए। आप हमारी भाषा का व्याकरण बना दें।" तब तक वेदभाषा "अव्याकृता" थी; उसे यों ही लोग काम में ला रहे थे। इंद्र ने "वरम्" कहकर देवों की प्रार्थना स्वीकार कर ली और फिर पदों को ("मध्यस्तोऽवक्रम्य") बीच से तोड़ तोड़कर प्रकृति प्रत्यय आदि का भेद किया-व्याकरण बन गया।
इस प्रकार भारत में सबसे पहले "व्याकरण" विद्या का जन्म हुआ।

व्याकरण भाषा का विश्लेषक है, नियामक नहीं

व्याकरण से भाषा की गति नहीं रुकती, जैसा पहले कहा गया है; और न व्याकरण से वह बदलती ही है। किसी देश प्रदेश का भूगोल क्या वहाँ की गतिविधि को रोकता बदलता है? भाषा तो अपनी गति से चलती है। व्याकरण उसका (गति का) न नियामक है, न अवरोधक ही। हाँ, सहस्रों वर्ष बाद जब कोई भाषा किसी दूसरे रूप में आ जाती है, तब वह (पुराने रूप का) व्याकरण इस (नए रूप) के लिए अनुपयोगी हो जाते है। तब इस (नए रूप) का पृथक् व्याकरण बनेगा। वह पुराना व्याकरण तब भी बेकार न हो जाएगा; उस पुरानी भाषा का (भाषा के उस पुराने रूप का) यथार्थ परिचय देता रहेगा। यह साधारण उपयोगिता नहीं है।
हाँ, यदि कोई किसी भाषा का व्याकरण अपने अज्ञान से ग़लत बना दे, तो वह (व्याकरण) ही ग़लत होगा। भाषा उसका अनुगमन न करेगी और यों उस व्याकरण के नियमों का उल्लंघन करने पर भी भाषा को कोई ग़लत न कह देगा। संस्कृत के एक वैयाकरण ने "पुंसु" के साथ "पुंक्षु" पद को भी नियमबद्ध किया; परंतु वह वहीं धरा रह गया। कभी किसी ने "पुंक्षु" नहीं लिखा बोला। पाणिनि ने "विश्रम" शब्द साधु बतलाया; "श्रम" की ही तरह "विश्रम"। परंतु संस्कृत साहित्य में "विश्राम" चलता रहा; चल रहा है और चलता रहेगा। भाषा की प्रवृत्ति है। जब पाणिनि ही भाषा के प्रवाह को न रोक सके, तो दूसरों की गिनती ही क्या।

व्याकरण और भाषाविज्ञान

व्याकरण तथा भाषाविज्ञान दो शब्दशास्त्र हैं; दोनों का कार्यक्षेत्र भिन्न-भिन्न है; पर एक दूसरे के दोनों सहयोगी हैं। व्याकरण पदप्रयोग मात्र पर विचार करता है; जब कि भाषाविज्ञान "पद" के मूल रूप (धातु तथा प्रातिपदिक) की उत्पत्ति व्युत्पत्ति या विकास की पद्धति बतलाता है। व्याकरण यह बतलाएगा कि (निषेध के पर्य्युदास रूप में) "न" (नञ्) का रूप (संस्कृत में) "अ" या "अन्" हो जाता है। व्यंजनादि शब्दों में "अ" और स्वरादि में "अन्" होता है - "अद्वितीय", "अनुपम"। जब निषेध में प्रधानता हो, तब ("प्रसज्य प्रतिषेध" में) समास नहीं होता - अयं ब्राह्मणो नाऽस्ति", "अस्य उपमा नास्ति"। अन्यत्र "अब्राह्मणा: वेदाध्ययने मंदादरा: संति" और "अनुपमं काश्मीरसौंदर्य दृष्टम्" आदि में समास होगा; क्योंकि निषेध विधेयात्मक नहीं है। व्याकरण समास बता देगा और कहाँ समास ठीक रहेगा, कहाँ नहीं; यह सब बतलाना "साहित्य शास्त्र" का काम है। "न" से व्यंजन (न्) उढ़कर "अ" रह जाता है और ("न" के ही) वर्णत्य से "अन्" हो जाता है। इसी "अन्" को सस्वर करके "अन" रूप में "समास" के लिए हिंदी ने ले लिया है - "अनहोनी", "अनजान" आदि। "न" के ये विविध रूप व्याकरण बना नहीं देता; बने बनाए रूपों का वह "अन्वाख्यान" भर करता है। यह काम भाषाविज्ञान का है कि वह "न" के इन रूपों पर प्रकाश डाले।
व्याकरण बतलाएगा कि किसी धातु से "न" भाववाचक प्रत्यय करके उसमें हिंदी की संज्ञाविभक्ति "आ" लगा देने से (कृदंत) भाववाचक संज्ञाएँ बन जाती हैं-आना, जाना, उठना, बैठना आदि। परंतु व्याकरण का काम यह नहीं है कि आ, जा, उठ, बैठ आदि धातुओं की विकासपद्धति समझाए। यह काम भाषाविज्ञान का है। संस्कृत में ऐसी संज्ञाएँ नपुंसक वर्ग में प्रयुक्त होती हैं - आगमनम्, गमनम्, उत्थानम्, उपवेशनम् आदि। परंतु हिंदी में पुंप्रयोग होता है-"आपका आना कब हुआ?" हिंदी ने पुंप्रयोग क्यों किया, यह व्याकरण न बताएगा। वह अन्वाख्यान भर करेगा -"ऐसी संज्ञाएँ पुंवर्गीय रूप रखती है" बस! यह बताना भाषाविज्ञान का काम है कि ऐसा क्यों हुआ!

परकीय शब्दों का शासन

जब कोई भाषा किसी दूसरी भाषा से कोई शब्द लेती है, तो उसे अपने शासन में चलाती है - अपने व्याकरण के अनुसार उसकी गति नियंत्रित करती है। हिंदी का "धोती" शब्द अंग्रेजी में गया, तो वहाँ इसे अंग्रेजी व्याकरण को शिरोधार्य करना पड़ा। प्रयोग होता है अंग्रेजी में - "ब्रिंरग अवर धोतीज"। वहाँ "धोती" का बहुवचन "धोतियाँ" न चलेगा। "ब्रिंग अवर धोतियाँ" प्रयोग वहाँ ग़लत समझा जाएगा।
इसी तरह अंग्रेजी का "फुट" शब्द हिंदी ने लिया और अपने शासन में रखा। अंग्रेजी में "फुट" का बहुवचन "फीट" होता है; पर हिंदी में अंग्रेजी व्याकरण न चलेगा। प्रयोग होता है - "चार फुट ऊँचाई", "चार फीट ऊँचाई" ग़लत है। "ऊँचाई" भी ग़लत है; "उँचाई" शुद्ध है। "निचाई उँचाई" होता है; "नीचाई ऊँचाई" नहीं।
संस्कृत में इकारांत शब्दों के द्विवचन ईकारांत हो जाते हैं- "कवि समागतौ"; हिंदी में ऐसा न होगा। "दो कवि आए" कहा जाएगा। इसी तरह संस्कृत में "राजदपंती समागतौ"। हिंदी में "राजदंपति" सर्वत्र।
परकीय शब्दों को आत्मसात् करने की यह भी एक प्रक्रिया है कि अनमेल रूप को काट छाँटकर अपने मेल का बना लेना। हिंदी का "गंगा जी" शब्द अंग्रेजी में गया; पर "गेंजिज" बनाकर। अंग्रेजी "लैंटर्न" शब्द हिंदी ने लिया; पर "लालटेन" बनाकर और "हॉस्पिटल" को "अस्पताल" बनाकर। "हस्पताल" भी हिंदी में ग़लत है। "हॉस्पिटल" और "डॉक्टर" जैसे रूप हिंदी को ग्राह्य नहीं। हिंदी का व्याकरण नियमन करेगा कि हिंदी में वह उच्चारण है ही नहीं, जिसे स्वर पर उल्टा टोप रख कर प्रकट किया जाता है। यहाँ "मास्टर" की ही तरह डाक्टर" चलता है। हाँ, नागरी लिपि में अंग्रेजी भाषा लिखनी हो तब वह उलटा टोप काम आएगा - द डॉक्टर वाज़ फुलिश"। इसी तरह नागरी में फारसी जैसी भाषा लिखनी हो तो "बाज़ार", "जरूरत" आदि रूप रहेंगे; पर हिंदी में नीचे बिंदी न रहेगी - "जरूरी चीजों के लिए बाजार है।" उर्दू के शेर आदि लिखने हों तो भी नीचे विंदी लग जाएगी। शब्दों का यह रूपनिर्धारण व्याकरण के वर्ण प्रकरण से होगा।